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अगली मुलाकात के इंतजार में

अगली मुलाकात के इंतजार में   जो कहानी एक मुलाकात ऐसी भी से शुरू हुई थी।  अब वह नया और अलग मोड़ ले चुकी थी। . अब नाम बदलने के साथ साथ भाव भी बदल चूका था।  परिवर्तन प्रकर्ति का नियम है तो वो अब हो चूका था।  और होता भी क्यूँ न वैसे भी जीवन में कुछ भी तो स्थाई जैसा नहीं होता है।  हमें लगता जरूर है लेकिन असल में तो स्थाई सिर्फ अस्थाई का विलोम ही होता है।  अगली मुलाकात के इंतजार में  अब शीर्षक एक मुलाकात ऐसी भी पूरी तरह बदल चूका था।  और नया शीर्षक अगली मुलाकात का इंतजार हो चूका था।  अब अगली मुलकात थोड़ी मुश्किल सी लगी थी।  क्यूंकि पिछली बार सीमाएं ताक़ पर जो रखी थी। हालाँकि सीमाएं तो दोनों ने अपनी मर्जी से और सहजता से लांघी थी।  लेकिन जब मुलाकात के बात समझ आया कि क्यों ही लांघी थी। असल  में आप कुछ और ही सोच रहे हो ये असर सीमाएं लांघने से कहीं ज्यादा किसी और वजह से था।  आखिरी मुलाकात के बाद दोनों ने महसूस किया कि ऐसे दूर होकर जीना कितना मुश्किल था।  अगली मुलाकात के इंतजार में  तो फिर अगली मुलाकात से पहले यें रुकावटें ...

वक्त का भी बड़ा अजीब किस्सा है।

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  बैठे बैठे यूं ही कुछ लिख दिया जरा टिप्पणी करना कैसा क्या है। #वक्त_का_भी_बड़ा_अजीब_किस्सा_है । जिनके पास खाली वक्त पड़ा है वें सोचते हैं काटूं कैसे। यह भी सच है कि उनके पास कोई काम नहीं है तो कटेगा भी कैसे।। लेकिन जरा उनकी भी तो सोचो जो कहते हैं वक्त मिलता नहीं कोई काम करूं कैसे।। वे अपने कामों में बिजी ही इतने रहते हैं वक्त मिले भी तो कैसे ।। वक्त का भी बड़ा अजीब किस्सा है... खैर वक्त खुद तो एक ही है लेकिन दोनों के किरदार अलग हैं।। और वे दोनों ही वक्त को लेकर परेशान हैं क्योंकि दोनों का नजरिया अलग है।। वक्त को तो शिकायत दोनों से ही नहीं है। लेकिन बिचारे वक्त की किस्मत तो देखो कि दोनों को ही शिकायत वक्त से है।। वक्त का भी बड़ा अजीब किस्सा है... और खास बात तो देखो तीनों ही अनवरत चले जा रहे हैं। ना वक्त रुक रहा है ना काम रुक रहा है और निठल्ले लोग वक्त काट भी रहें हैं।। वक्त का भी बड़ा अजीब किस्सा है। सुभाष फौजी